एक छोटे से शहर में आरव नाम का एक युवा रहता था।
वह आधुनिक सोच वाला था। उसे लगता था कि कान छिदवाना केवल फैशन है — खासकर लड़कियों के लिए।
एक दिन वह अपने दादाजी के साथ बैठा था। दादाजी प्राचीन भारतीय परंपराओं के ज्ञाता थे। बातचीत के दौरान आरव ने हँसते हुए कहा,
“दादाजी, ये कान छिदवाने की परंपरा भी अजीब है। आज के समय में इसकी क्या ज़रूरत है?”
दादाजी मुस्कुराए।
उन्होंने कहा, “तुम्हें लगता है यह सिर्फ आभूषण पहनने के लिए है?”
आरव ने सिर हिलाया, “और क्या?”
दादाजी उसे अपने कमरे में ले गए। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराम और बुद्ध की तस्वीरें थीं — सभी के कान छिदे हुए।
उन्होंने पूछा,
“क्या तुम्हें लगता है ये सब फैशन कर रहे थे?”
आरव चुप हो गया।
दादाजी बोले,
“कर्णवेध कोई सजावट नहीं, बल्कि एक प्राचीन विज्ञान है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले समझ लिया था कि कान की लौ (ear lobe) मस्तिष्क से सीधा जुड़ी होती है।”
उन्होंने समझाया —
“हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ हैं। ये जीवन ऊर्जा — प्राण — को पूरे शरीर में पहुँचाती हैं। कान की लौ एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जो मस्तिष्क के दाएँ और बाएँ भाग को संतुलित करती है।”
आरव ने आश्चर्य से पूछा,
“मतलब यह दिमाग पर असर करता है?”
“हाँ,” दादाजी ने कहा,
“बायाँ मस्तिष्क तर्क और गणित का केंद्र है, और दायाँ मस्तिष्क रचनात्मकता और भावनाओं का। कान की सही जगह छेद करने से दोनों का संतुलन बनता है।”
उन्होंने आगे बताया —
“पहले गुरुकुल में शिक्षा शुरू करने से पहले बच्चों का कर्णवेध किया जाता था। यह मस्तिष्क को ज्ञान ग्रहण करने के लिए तैयार करता था।”
आरव अब गंभीर हो चुका था।
दादाजी बोले,
“कान की लौ पर छेद करना एक तरह का ‘झटका’ (shock) है — जो चेतना को जगाता है। इससे रक्तसंचार बढ़ता है, पिट्यूटरी ग्रंथि सक्रिय होती है, और स्मरण शक्ति मजबूत होती है।”
“और यह केवल बुद्धि तक सीमित नहीं,” उन्होंने कहा।
“यह वागस नाड़ी (Vagus Nerve) को भी प्रभावित करता है, जो चिंता और अवसाद को नियंत्रित करती है।”
आरव को याद आया कि आजकल उसके कई मित्र चिंता और तनाव से जूझ रहे थे।
दादाजी ने आगे कहा,
“कर्णवेध का संबंध दृष्टि से भी है। कान और आँखों की नसें जुड़ी होती हैं। सही बिंदु पर छेदन करने से दृष्टि और मानसिक स्पष्टता बेहतर होती है।”
“और क्या यह सच है कि इसका संबंध स्वास्थ्य से भी है?” आरव ने पूछा।
“हाँ,” दादाजी बोले,
“यह प्रजनन स्वास्थ्य, हार्मोन संतुलन, और प्रतिरक्षा शक्ति को भी मजबूत करता है। इसलिए इसे 3 से 5 वर्ष की आयु में करना सर्वोत्तम माना गया है।”
“लेकिन आजकल लोग मशीन से या कान के ऊपर कार्टिलेज में छेद करवा लेते हैं,” आरव ने कहा।
दादाजी ने सिर हिलाया,
“वही तो गलती है। सही स्थान — नरम कान की लौ — पर पारंपरिक सुई से छेदन करना चाहिए। और सोना या तांबा पहनना चाहिए, क्योंकि धातुओं की अपनी ऊर्जा होती है।”
उन्होंने गहरी आवाज़ में कहा —
“हमने अपनी परंपराओं को अंधविश्वास समझकर छोड़ दिया। लेकिन पश्चिमी विज्ञान अब धीरे-धीरे वही बातें खोज रहा है जिन्हें हमारे ऋषि पहले से जानते थे।”
आरव अब बदल चुका था।
उसे समझ आ गया कि कर्णवेध केवल एक संस्कार नहीं — बल्कि चेतना को जगाने का द्वार है।
दादाजी ने अंत में कहा,
“मनुष्य जन्म केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
यह पशु प्रवृत्ति से मानव चेतना और फिर दिव्य संभावना की ओर यात्रा है।
कर्णवेध उस यात्रा का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है।”
उस दिन आरव ने जाना —
कुछ परंपराएँ फैशन नहीं,
विज्ञान और चेतना की विरासत होती हैं।